06.27.08

चुनौतियों के भंवर में स्त्री अस्मिता

Posted in Uncategorized at 11:21 am by YUDHISTRA

िछले कुछ वर्षो से स्त्री विमर्श चर्चा में हैं लेकिन हिंदी कथा साहित्य में यह कोई नया विषय नहीं। प्रेमचंद की निर्मला हो या जैनेंद्र की सुनीता, यशपाल की शैल हो या अज्ञेय की रेखा-नारी अस्मिता का सवाल अपनी संपूर्णता एवं विविधता में कथा साहित्य के केंद्र में रहा है लेकिन आज की वरिष्ठ एवं नई पीढी की लेखिकाओं ने स्त्री की इस पुरुषरचित छवि पर सवाल खडे किए हैं। स्त्री अस्मिता के लिए संपत्ति, सत्ता और स्वाभिमान की मौजूदगी के साथ-साथ जब तक स्वविवेक से फैसला लेने की चेतना जाग्रत नहीं होगी, तब तक वह अपने को स्वतंत्र मानने की अधिकारिणी भला कैसे हो सकती है?
आजादी के बाद हिंदी कथा साहित्य में उभरते नई कहानी आंदोलन में स्त्री जीवन से जुडे सवाल उठाए गए। उषा प्रियम्वदा, मन्नू भण्डारी, कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा, मृणाल पांडे, मंजुल भगत, ममता कालिया और प्रभा खेतान जैसी दर्जनों कथाकारों ने पुरुष वर्चस्ववादी चौहद्दियों को तोडने का साहस किया। इस दौर में लिखे साहित्य में एक तरफ सामाजिक परंपराओं एवं आर्थिक शिकंजे में कैद स्त्री की छटपटाहट दर्ज थी तो दूसरी तरफ थी आधुनिकता की सीढी लांघती स्त्री की उडान। अब तो प्रतिरोध की कमान संभालने आई अनारो सरीखी दमदार नायिकाएं। स्वावलंबी पति पत्नी के बीच पनपते वैचारिक मतभेद का जीवंत नमूना था- आपका बंटी जिसके द्वारा एकल बच्चे का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। तभी आयी बेघर जैसी रचना जिसमें स्त्री की स्वतंत्र सोच और सप्राण संवेदना को एक नए कोण से उभारा गया।
स्त्री अपनी ऐतिहासिक, सामाजिक स्थिति के जिस बिंदु से जिस खास यथार्थ को बूझ पाती है, उस विशिष्ट संवेदना को पकड पाना स्त्री के अलावा किसी और के बूते की बात नहीं। इसी सदी में जिन कथा लेखिकाओं ने स्त्री होने के पुराने अर्थो और संदर्भो को पलटकर स्त्री की आधुनिक जटिल होती संवेदना को उभारा- उनमें प्रमुख स्वर हैं- मैत्रेयी पुष्पा, मृदुला गर्ग, चित्रा मुद्गल, ममता कालिया और प्रभा खेतान। समकालीन सूचना प्रौद्योगिकी से लैस चमचमाती स्त्रियों की आकांक्षाओं, स्वप्नों और संभावनाओं को बारीकी से उकेरने वाली महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं- अनामिका, जया जादवानी, मधु कांकरिया, अलका सरावगी, सुषमा मुनीन्द्र, उर्मिला शिरीष और मनीषा कुलश्रेष्ठ।
बेशक समाज बदल रहा है तो यथार्थ की जटिलताएं भी बढी हैं और उसी हिसाब से स्त्री जीवन की चुनौतियां भी। स्त्री की जटिलताओं को समझने की जागरूकता बढी है और बहुतेरी दिशाएं भी खुल रही हैं, सो आधुनिक कथा साहित्य में परंपरागत पुरुषवादी फ्रेम को तोडकर स्त्री के भीतरी व्यक्तित्व को पूरी निधडकता से खोला जाने लगा है। महज स्त्री भर होने से उसे दोयम दर्जे की कतई न समझा जाए बल्कि वह भीतरी आजादी को एक स्वतंत्रचेता मनुष्य की तरह महसूसें जिसमें उसका आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की लौ उद्भासित हो सके। स्त्री के आत्मविस्तार और आत्माभिव्यक्ति की नैसर्गिक इच्छा एक ऐसी ठोस वास्तविकता है जिसे स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही। अब समय आ गया है कि हम इस तरफ एक नया और खुला नजरिया लेकर सोचें और कुछ सार्थक कदम उठाएं।
पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्था से उपजती सामंती वृत्ति और पितृसत्तात्मक संरचनाओं के चलते आज की तथाकथित आजाद स्त्री की संपूर्ण आजादी जिसमें उसकी सामाजिक भागीदारी पुरुषों के समकक्ष हो, यह फिलहाल स्वप्न ही है। पुरुष श्रेष्ठता से संचालित व्यवस्था में स्त्री के पक्ष में एक मुकम्मल साझीदार का बाजिब हक देना होगा। कब होगा वैसा संतुलित समाज जहां स्त्री पुरुष के समानाधिकारों से लैस एक मनुष्यवादी व्यवस्था कायम रह सके? पुरुष वर्चस्ववाद के खिलाफ छेडी मुहिम में स्त्री की आजादी जब तक उसकी अंदरूनी दुनिया का सच नहीं बनेगी, तब तक भला कैसे सुनिश्चित हो पाएगी आधी दुनिया की साझेदारी?
इधर के कथासाहित्य में दहेज हत्या, बलात्कार, पारिवारिक हिंसा, लिंग परीक्षण और परित्यक्ता- तलाकशुदा स्त्रियों से जुडे मुद्दे लगातार विमर्श के केंद्र में हैं। आज भूमण्डलीकरण वनाम भूमण्डीकरण के दौर में स्त्रियों के केंद्र में मुख्यत: मध्यवर्गीय स्त्रियां ही हैं, निम्न वर्ग या उच्च वर्ग की स्त्रियों का संघर्ष थोडे अलग किस्म का है। कामगार महिलाओं की जमीनी लडाई के बारे में बंगाल में ज्योतिर्मयी देवी, महाराष्ट्र में ताराबाई, सावित्रीबाई फुले ने स्त्रियों की बराबरी के हक के साथ-साथ शिक्षा की गुहार लगाई।
इस वैज्ञानिक युग में आधुनिक सोच के तमाम दावों के बावजूद स्त्री की सामाजिक हैसियत में कोई बहुत बडी तब्दीली नजर नहीं आती। आज की कमाऊ स्त्रियां भी कहे अनकहे समझौतों और दोहरे कार्यभार से ग्रस्त हैं। बेशक नयी कहानी के जमाने की बेचारी या आसानी से बरगलाई जाने वाली पी.ए./ टाइपिस्ट या स्कूल शिक्षिकाओं के जमाने अब लद गए। आज की तेज तर्रार शिक्षित स्त्रियां सरकारी और गैर सरकारी उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हैं लेकिन कितनी बडी विडंबना है कि ऐसी स्त्रियों से असुरक्षित महसूसते पुरुष दिनोंदिन ज्यादा शंकालु और हिंसक होते जा रहे हैं। आर्थिक आजादी से रिश्तों की जकडनें जटिल से जटिलतर होती जा रही हैं। प्रताडना के नित नए औजारों पर धार दी जा रही है। दरअसल पुरुषसत्ता की जडें इतनी गहरे धंसी हैं जिन्हें तोडना या बदलना सचमुच एक लंबी लडाई होगी।
आज की लेखिकाएं पूरे दम-खम के साथ स्त्री के अनछुए पन्नों को बेबाकी से खोलने लगी हैं। आज की कहानी पूरी पारदर्शिता के साथ स्त्री स्वतंत्रता के भ्रामक बाहरी आवरणों को भेदकर स्त्री की अंदरूनी दुनिया में घुसपैठ करने लगी हैं। सच तो यह है कि स्त्री अपनी कर्मठता, जुझारूपन और जीवटता की लाठी पकड अपने खोए वजूद को दुबारा हासिल कर सकती है। अप्प दीपो भव- के सूत्र के सहारे वह खुद अपनी अजस्त्र शक्तियों को पहचान कर अपनी बागडोर मुट्ठी में पकड अपने तयशुदा रास्तों पर चलने का साहस कर सकती है। हमें बडी उम्मीद है उन स्त्रियों से जो अपने मामूली सपनों की आग से छोटे-छोटे आंदोलन चलाने की कोशिश कर रही हैं। – जल, जमीन और जंगल की जमीनी लडाई लडने वाली आदिवासी और हाशिए पर फिकी औरतों की आंखों में अभी भी भविष्य के सुंदर सपने दिपदिपा रहे हैं। उनके संकल्प और मजबूत इरादों की एक बानगी भर- टूटी हुई मुंडेर पर छोटा सा एक चिराग। मौसम से कह रहा है, आंधी चला के देख।।
[डॉ. रजनी गुप्त]

अकबर की खूबसूरत कल्पना थीं जोधा: रूश्दी

Posted in Uncategorized at 11:19 am by YUDHISTRA

ऐसा लगता है कि सलमान रूश्दी का विवादों से गहरा नाता है। रूश्दी नए उपन्यास द एनचैन्ट्रेस आफ फ्लोरेंस ने एक बार फिर उन्हें कठघरे में खडा कर दिया है।
रूश्दी की कलम से लिखे इस उपन्यास में कहा गया है कि जोधाबाई अकबर की खूबसूरत कल्पना थीं। रूश्दी ने अपने ज्यादातर उपन्यासों में राजनीतिक द्वंद्व को कथानक का आधार बनाया है, पर उनका नया उपन्यास द एनचैंन्ट्रेस ऑफ फ्लोरेंस स्त्री सौंदर्य के प्रभाव का वर्णन करता है। रूश्दी ने यह उपन्यास 16वीं सदी के मुगल बादशाह अकबर एवं उनकी पत्नी और पे्रमिका जोधा को केंद्र में रखकर लिखा है। रूश्दी ने जिस जोधा का वर्णन किया है उसके सौंदर्य के आगे पुरुष विचलित हो उठते हैं।
* अकबर एवं जोधा के प्रति आकर्षण
-रूश्दी कहते हैं कि किशोरावस्था से लेकर अब तक मैंने अकबर और जोधा के चरित्र पर आधारित अनेक लोकप्रिय फिल्में देखी हैं। जोधा और अकबर की कहानी आकर्षण के लिहाज से काफी हद तक अंग्रेजी उपन्यास गान विद द विंड से मिलती-जुलती है। हाल ही में जोधा-अकबर फिल्म की रिलीज के साथ ही जोधा के अस्तित्व को लेकर एक बार फिर इतिहासकारों के बीच बहस छिड गई।
रूश्दी कहते हैं कि काफी अनुसंधान के बाद मुझे महसूस हुआ कि इस बात की काफी संभावना है कि बेहद खूबसूरत हिंदू राजकुमारी के रूप में जोधा का चरित्र अकबर की कल्पना का परिणाम था। मैंने सोचा कि यदि इतिहासकार जोधा को अपनी समझ के अनुरूप अभिव्यक्त कर सकते हैं तो मुझे भी थोडी स्वतंत्रता है।
इधर रूश्दी द्वारा जोधाबाई को अकबर की कल्पना बताने पर बुद्धिजीजियों ने उनकी आलोचना की है, किन्तु रूश्दी इन आलोचनाओं से बिल्कुल बेफिक्र हैं। वह कहते हैं कि साहित्यिक आलोचनाओं को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के लिए यह जिंदगी काफी छोटी है।
* विवादों से गहरा रिश्ता
-रूश्दी वर्ष 1988 में अपने चौथे उपन्यास द सैटेनिक वर्सेस के प्रकाशन के साथ ही विवादों में घिर गए थे। इस उपन्यास के संदर्भ में ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरू अयातुल्ला खोमैनी ने रूश्दी को ईशनिंदा का दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ मौत का फतवा जारी किया था। यह फतवा वापस लेने की अंतरराष्ट्रीय समुदाय की गुजारिश पर ईरान सरकार का कहना है कि फतवा वापस लेने का अख्तियार उसी व्यक्ति को है, जिसने फतवा जारी किया है। यह फतवा जारी होने के बाद से ही रूश्दी ने ब्रिटेन में शरण ले रखी है। हालांकि अब उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं लगता।
रूश्दी कहते हैं कि 14 फरवरी को वैलेंटाइन कार्ड की तरह हर साल कट्टरपंथियों की ओर से मुझे मौत की चेतावनी वाला खत मिलता है, जिसमें मुझे यह याद दिलाने की कोशिश की जाती है कि कट्टरपंथियों के ह्रदय में मेरी हत्या का संकल्प अभी भी कायम है। समय के साथ इतना फर्क जरूर आया है कि अब मुझे मौत के पैगाम में दहशत के बजाए कविता नजर आने लगी है।
* अगला उपन्यास
-रूश्दी कहते हैं कि एक लेखक के तौर पर मैंने स्वयं को सदा राजनीतिक विषयों के करीब पाया, पर किसी भी चीज की अति बुरी है। अपने ताजा उपन्यास के जरिए मैंने अपने लेखन में नए विषय को समाहित किया है। मैं अपना अगला उपन्यास बच्चों के लिए लिखना चाहता हूं।

सलमान रुश्दी को नाइटहुड सम्मान

Posted in Uncategorized at 11:13 am by YUDHISTRA

भारत में जन्मे ब्रिटेन के विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी को साहित्य में सेवाओं के लिए बुधवार को यहां महारानी एलिजाबेथ ने नाइटहुड की उपाधि प्रदान की। जब बीते वर्ष यह सम्मान देने की घोषणा की गई थी तब विश्वभर के मुस्लिमों ने इसकी निंदा की थी।
समारोह बकिंघम पैलेस में हुआ। कई किताबें लिख चुके 61 वर्षीय रुश्दी की वर्ष 1989 में आई किताब द सेटेनिक वर्सेस से विवाद खडा हो गया था। लंदन में यह सम्मान मिलने के बाद रुश्दी ने कहा कि मैं बहुत खुश हूं और गर्व महसूस कर रहा हूं। बीबीसी के अनुसार रुश्दी ने बताया कि उन्होंने महारानी के हाथों पुरस्कार ग्रहण करने की रिकार्डिग इसलिए नहीं कराई क्योंकि यह एक निजी क्षण था। उन्होंने कहा कि इतनी समस्याएं खडी होने के बावजूद उन्हें द सेटेनिक वर्सेस लिखने को लेकर कोई अफसोस नहीं है।

गुरुदेव और उनका शांतिनिकेतन

Posted in Uncategorized at 11:11 am by YUDHISTRA

पचास के दशक में, कविवर भवानी तिवारी द्वारा हिन्दी में अनूदित रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि के मधुर गीतों को अक्सर मैं राष्ट्रकवि पं. माखनलाल चतुर्वेदी को सस्वर सुनाया करता था और वे उन गीतों का झूम-झूमकर आनन्द लिया करते थे।
दादा माखनलाल जी का गुरुदेव रवीन्द्रनाथ से बडे निकट का संबंध था। संभवत: सन् 1934 में रवीन्द्रनाथ ने माखनलाल जी को शांतिनिकेतन में शरदोत्सव की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया था। इसके पूर्व सन् 1927 में भरतपुर के हिंदी साहित्य सम्मेलन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर पधारे थे। इस सम्मेलन में राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन, पं. माखनलाल चतुर्वेदी और अमर शहीद गणेशशंकर विद्यार्थी भी उपस्थित थे। माखनलाल जी की अध्यक्षता में वहां पर संपादक-सम्मेलन का आयोजन भी किया गया था, उसमें गुरुदेव बोले थे। उनके बारे में माखनलाल जी लिखते हैं- रवि ठाकुर, रेशमी लबादा पहने हुए थे। उनकी दाढी के बालों ने शुभ्रता की ओर जोर-शोर से कदम बढाया था और उनकी आंखों के तेजस्वी पानी में स्वतंत्र भारत का उ”वल भविष्य खेल रहा था। वे मखमल जैसे कोमल शब्द बोल रहे थे। उन शब्दों में फूलों जैसी सुगन्ध, पत्तों जैसा हरियालापन और फलों सा मीठा स्वाद हम सभी अनुभव कर रहे थे, लोग गद्गद हो रहे थे। शांतिनिकेतन के उस संत को वाणी, वरदान की तरह प्राप्त थी।
मेरे मन में उस स्थान को देखने का कौतूहल था, जहां बैठकर महाकवि ने गीतांजलि जैसे काव्य-ग्रंथों की संरचना की थी। 1986 में मेरी यह इच्छा फलीभूत हुई। हिन्दी पाठ्यक्रम विकास केंद्र की तीन दिवसीय कार्यशाला के संयोजक प्रो. शिव प्रसाद सिंह थे और प्रो. रामसिंह तोमर- स्थानीय संयोजक। इसमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के हिंदी के विभागाध्यक्ष पधारे हुए थे। साथ ही मेरे मित्र डॉ. प्रभाकर माचवे, प्रो. विष्णुकान्त शास्त्री, कोलकाता (पूर्व गवर्नर, यू.पी.), प्रो. वसु (तात्कालिक उपकुलपति, विश्व भारती), ये सभी मेरे समीप ही बैठे हुए थे। इस अवसर पर डॉ. प्रभाकर माचवे के रसमय वक्तव्य के बाद बोलने का अवसर मिलने पर मैंने कहा कला तथा सौंदर्य के इस तीर्थस्थल पर गुरुदेव की संगीतमयी वाणी का रंगों भरा सुगंधित वैभव देख कर यहां की झोपडियों की मिट्टी से बनी दीवारों पर रामायण और महाभारतकाल तथा बुद्ध जातकों की घटनाओं के चित्रों के दर्शन करके, द्वारों पर उपनिषदों के वाक्यों को पढकर, पत्थरों व शिलाखण्डों पर उतारी गई कोमल मानव-मनोभावनाओं को निहार कर, ऐसा लगता है कि स्वर्ग, धरती पर उतर आया है। यदि भारतीय-संस्कृति, दर्शन, कला, साहित्य व प्रकृति-सौंदर्य, ये सब एक साथ मिल कर देह धारण करलें तो गुरुदेव की प्राणवान-रचना शांति निकेतन के सिवा उसका दूसरा कोई नाम हो ही नहीं सकता। शांतिनिकेतन में कला अपने खुले हाथों से सौंदर्य का वैभव लुटा रही है। जो वहां जाता है, वह निहाल हो जाता है। शांति निकेतन अपने आप में संस्कृति का शास्त्र है। उसको मेरे सौ-सौ वन्दन। वहां रहते हुए शांतिनिकेतन से लगा हुआ श्रीनिकेतन भी हमने देखा। श्रीनिकेतन में गांव की परिचर्या के लिए लोग तैयार किये जाते हैं। नन्दलाल वसु जैसे प्रख्यात कलाकार के चित्रों से श्रीनिकेतन के कच्चे घर सुशोभित हैं। हमने उन सभी स्थानों के दर्शन किये जहां गुरुदेव की स्मृति व्याप्त है, जिनमें एक महत्वपूर्ण स्थान उत्तरायण है। गुरुदेव के कर्मजीवन के महत्वपूर्ण अंतिम दो दशकों के यहां के मकान साक्षी हैं। ये सभी भवन सन् 1920 से सन् 1939 ई. के बीच निर्मित हुए हैं।
इसी तरह कोणार्क, नूतनवाडी, उद्यन, विचित्रा, वेणुकुंज, पुनश्च, उदीची आदि सुंदर महत्वपूर्ण स्थल हैं। इन सबके अतिरिक्त श्यामली एक ऐसा घर है, जो मिट्टी से बना है, उसकी छत भी मिट्टी की बनी हुई है। छत पर फूस का उपयोग नहीं किया गया है। हमें बताया गया कि इस अनोखी बात ने कवि के हृदय को खुशी से लबालब कर दिया था। श्यामली की दीवारों पर कलाकार्य तबके कलाभवन के विद्यार्थियों के हाथों से किया गया है। इस घर की सौंदर्य छटा से गुरुदेव इतने अभिभूत हुए थे कि वे इसके चबूतरे पर बैठकर लिखा करते थे। कस्तूरबा के साथ गांधी जी ने भी सन् 1940 में श्यामली में ही आतिथ्य ग्रहण किया था। ऐसा लगता है, मानो श्यामली कवि के रचना संसार की प्रेरणा शक्ति रही हो।
इस प्रवास में गुरुदेव की रचनाएं हमारी चर्चा का विषय रहीं। मेरी विनम्र राय में गुरुदेव की रचनाओं में उपनिषदीय सूझों का वैभव प्रार्थनाओं के रूप में स्पष्ट झांकता नजर आता है। जिसका उत्कर्ष है गीतांजलि जिसके अंग्रेजी अनुवाद के प्रकाशन [नवंबर, 1912] के बाद गुरुदेव विश्व समाज के समक्ष बहुत महत्वपूर्ण हो गये थे, यद्यपि उनकी इस कृति पर कुछ आलोचकों ने पाश्चात्य प्रभाव का आरोप लगाया, तथापि उसे नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। उनकी अन्य रचनाएं, जिनमें उनका सम्पूर्ण कवि रूप उभर कर आया, वे हैं- गार्डनर [अक्टूबर 1913], द क्रेसेन्ट मून [नवंबर 1913] साधना और अनुवाद वन हंड्रेड-पोयम्स ऑफ कबीर से उनके भारतीय चिन्तन पक्ष और उपनिषद की ओर संकेत मिलता है। पश्चिम संसार, रवीन्द्र को नदी का कवि कहता है क्योंकि उनकी कविताओं में अनेक स्थलों पर नदी के सौंदर्य, तरंग, प्रवाह तथा लहरों का जिक्र आता है।
यूं भी बंगाल, नदियों का ही प्रदेश है। ऋग्वेद में भाषा को नदी कहा गया है। नदी का धर्म है निनाद करना, भाषा भी निनाद है। भाषा की प्रांजलता, प्रवाहशीलता में ही जीवित रहती है। महाकवि ने नदी की इस सार्थकता का अपनी रचनाओं में बडी कुशलता के साथ निर्वाह किया है।
[कन्हैयालाल शर्मा निर्मल]

हिंदी जानने वालों का दर्द

Posted in Uncategorized at 10:58 am by YUDHISTRA

हैलो, दिल्ली विश्वविद्यालय हेल्पलाइन, जी मेरी लड़की के 12वीं में 57 फीसदी अंक आए हैं, बीए में दाखिला लेना है कौन से कालेज में मिलेगा। फोन करने वाले ने तो इतना बोल तो जरूर दिया, लेकिन हेल्पलाइन प्रतिनिधि यह समझ नहीं पाया कि 57 कितने को कहते हैं। हेल्पलाइन प्रतिनिधि जवाब देने के बजाए पूछ रहे हैं कि 57 को अंग्रेजी में कितना कहते हैं। यह एक उदाहरण तो बस बानगी है, जो हिंदी की उपेक्षा और हिंदी में फोन करने वालों के दर्द को बयां कर रहा है।
दिल्ली विश्वविद्यालय की हेल्पलाइन में पूरी तरह अंग्रेजीयत हावी है। हिंदी हाशिए पर है। हेल्पलाइन नंबरों पर फोन करके हिंदी में बात करने वालों की तो शामत है। सच तो यह है कि जिस प्रतिनिधि को हिंदी के वर्णमालाओं की तनिक भी जानकारी न हो, वह क्या हिंदी भाषी लोगों द्वारा अंकों को हिंदी में बताने पर क्या जवाब देगा। यह एक बड़ा सवाल है। आज भी ऐसे काफी फोन आते हैं, जिसमें फोन करने वाला विशुद्ध हिंदी में बात करता है और अंक प्रतिशत भी हिंदी वर्णमाला में ही बताता है।
जागरण संवाददाता

मानेकशा: पहले फील्ड मार्शल

Posted in Uncategorized at 10:55 am by YUDHISTRA

सेना के पूर्व प्रमुख एवं वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के हीरो पहले फील्ड मार्शल सैम मानेकशा के निधन के साथ ही एक युग का अंत हो गया। वे एक कुशल कमांडर के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे।
महायोद्धा मानेकशा ने 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में न सिर्फ भारत की महान सैन्य जीत में अहम भूमिका निभाकर इतिहास रचा, बल्कि इससे एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ। प्यार से साम बहादुर के नाम से मशहूर 94 वर्षीय मानेकशा ने वैसे तो कई लड़ाइयों में अविस्मरणीय भूमिका निभाई, लेकिन ऐतिहासिक क्षण उस वक्त आया जब 1971 में महज 14 दिन में पाकिस्तानी सेना को परास्त कर बांग्लादेश बना। उस समय 90 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया था।
मानेकशा की विशिष्ट उपलब्धि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान लड़ाई के मोर्चा पर बहादुरी के लिए मिलिट्री क्रास पाना था। वह पहले भारतीय अधिकारी थे जिन्होंने आजादी के बाद गोरखाओं की कमान संभाली। मानेकशा उन भारतीय सैन्य अधिकारियों में से एक थे जिन्होंने भारतीय सेना में फील्ड मार्शल का पद संभाला। दूसरे फील्ड मार्शल के एम करियप्पा थे। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ढाका जाने और पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण स्वीकार करने को कहा तो उदार हृदय के मानेकशा ने विनम्रतापूर्वक उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कहा कि यह सम्मान उनके पूर्वी कमांडर ले. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को मिलना चाहिए। मानेकशा ने कहा कि वह तभी जाएंगे जब पूरी पाकिस्तानी सेना आत्मसमर्पण कर देगी। कुशल रणनीतिकार मानेकशा ने काफी सावधानी से पूर्वी और पश्चिमी दोनों मोर्चो पर भारतीय हमले की योजनाएं तैयार की थी।
मानेकशा खुलकर अपनी बात कहने वालों में से थे। उन्होंने एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ‘मैडम’ कहने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि यह संबोधन ‘एक खास वर्ग’ के लिए होता है। मानेकशा ने कहा कि वह उन्हे प्रधानमंत्री ही कहेगे।
मानेकशा का जन्म तीन अपै्रल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका परिवार गुजरात के शहर वलसाड से पंजाब आ गया था। मानेकशा ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में पाई, बाद में वे नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए। वे देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने गए थे। वह 1969 में भारतीय सेना के आठवें प्रमुख बने।

First Field Marshal Sam Manekshaw passes away

Posted in Uncategorized at 10:52 am by YUDHISTRA

India’s first Field Marshal, The Padma Vibhushan and Military Cross awardee, 94-year old Sam Manekshaw died in a military hospital in Tamil Nadu late last night (26th June 2008). Manekshaw joined the Indian Military Academy in 1932.

06.26.08

India’s GDP forecast for 08/09 cut to 7.8 pct by S&P

Posted in Uncategorized at 1:56 pm by YUDHISTRA

Standard & Poor’s has cut India’s 08/09 GPD forecast from 8.1% to 7.8 % reason being high Inflation and rising interest rates.
“High interest rates, along with a slowing global economy, will trim GDP growth to 7.8 percent in 2008-09,” says Subir Gokarn, chief economist at Standard & Poor’s, Asia Pacific said.

अमरनाथ – श्रद्धालुओं का नया जत्था रवाना

Posted in Cultural Council at 6:21 am by YUDHISTRA

जम्मू में भगवती नगर आधार शिविर से अमरनाथ गुफा के लिए 2906 श्रद्धालुओं का नया जत्था बृहस्पतिवार को रवाना हुआ। कश्मीर के आधार शिविरों में लोगों की तादाद काफी अधिक होने के कारण बुधवार को यात्रा स्थगित कर दी गई थी।

अधिकारियों ने बताया कि जत्थे में 677 महिलाएं और 118 बच्चे शामिल हैं। तीर्थयात्री तड़के पांच बजकर दस मिनट के करीब भगवती नगर बेस कैंप से रवाना हुआ। इस कैंप से यात्रा एक हफ्ते के भीतर दो बार स्थगित हो चुकी है।

अधिकारियों ने यात्रा को स्थगित किए जाने का कारण जहां अधिक श्रद्धालुओं का आधार शिविरों में एकत्रित होना बताया है, वहीं सूत्रों ने बताया कि कश्मीर घाटी में प्रदर्शनों के चलते कानून-व्यवस्था की स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया। इससे पहले दो जून को भारी वर्षा और खराब मौसम के कारण यात्रा स्थगित कर दी गई थी।

06.24.08

Armaan Ebrahim wins the Grand Race of the Formula Renault V6 Championship Rd 4 in Sepang, Malaysia in style.

Posted in Uncategorized at 5:52 am by admin

Starting 2nd on the grid for the 15-lap race, Armaan made a storming start and shot into the lead into the 1st corner. From there on, it was a very tight race with James Grunwell and Earl Bamber on Armaan’s gearbox for the first few laps.
Armaan opened up a 2-second lead after lap 4 and managed to keep the two red cars behind him. Earl Bamber passed James and pushed Armaan for a few laps. James then passed Bamber again and the two in front moved away from Bamber a bit. Armaan would make time under braking into the corners and also through the two high speed corners, but would loose a lot of time on the straights, which allowed James to close in again and nullify the advantage Armaan gained under braking and the fast corners.
However, Armaan did not make a single mistake and kept James behind him all the way. In lap 12, James made a desperate move into corner 4, but Armaan held his line and alertly avoided a wild driving Grunwell and came out of the corner ahead. Armaan then pulled away just enough to hold his advantage until the chequered flag. In another desperate attempt on the last lap, Grunwell lunged into the corner and then out broke himself going off the track shortly. This gave enough room for Armaan to sail to the finish line as he knew the last straight would be critical due to lack of straight-line speed.
It was a very deserving win for young Armaan as the race was close for the entire 15 laps. Even more credit to the win was because Armaan is driving with a one-year-old engine and thus the lack of straight-line speed.
Armaan who qualified 2nd for the sprint race, finished 2nd in the sprint race on Saturday. After being the quickest in both practice sessions, Armaan managed a close 2nd in qualifying. Though he hounded Grunwell who won the sprint race, Armaan could not pass him, as there were not many racing laps due to two safety cars after a nasty accident involving Bamber and Charlie Charlez.
Commented Armaan: I had a perfect car and it was a perfect race. Yes, I knew that I was down on straight-line speed, but was confident enough as I had a lot more speed than Grunwell into the faster corners and under braking into the slower corners. It was just a question of not making a mistake and at the same time keep driving flat out, so that I gave them both no room at all. The team did a great job as usual and I really enjoyed a close race. I hope I can find some sponsorships that will enable me to get a fresh engine as the one I am using now is a year old and not been rebuilt.

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